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'बिआह' शब्द के प्रयोग मुख्य रूप से दूगो अर्थ में होला । एकर पहिला अर्थ उ क्रिया, संस्कार, विधि या पद्धति ह; जेकरा से मरद-मेहरारू के स्थायी-संबंध बनेला तथा एह सबंध के परिणाम के रूप में जामल संतान के माता पिता के सम्पत्ति के अधिकार मिलेला । पुराना जमाना के आ मध्यकाल के धर्मशास्त्री के साथ वर्तमान युग के समाजशास्त्री भी , समाज से मान्यता मिलल , परिवार की स्थापना करेवाला कवनो पद्धति के बिआह मान लेत रहन लेकिन मनुस्मृति के टीकाकार मेधातिथि (३। २०) के शब्द के अनुसार बिआह के एगो सुनिश्चित पद्धति आ अनेक विधि से संपन्न होखे वाला आ कन्या के अर्धांगिनी बनाने वाला संस्कार मानेले |भोजपुरी संस्कृति में मनु समृति के आधार प रचना भईल हिन्दू बिबाह पद्धति के प्रचलन ज्यादा बा |
बिआह के दोसर मतलब समाज के चलन आ समाज में मानल विधि से अपनावल मरद-मेहरारू के संबंध आ पारिवारिक जीवन भी होला। एह संबंध से मरद-मेहरारू के अनेक प्रकार के अधिकार आ कर्तव्य मिलेला एकरा से एक ओर जहाँ समाज मरद-मेहरारू के मैथुन के अधिकार देला ओहिजे दोसरा ओर मरद के मेहरारू आ संतान के पालन एवं भरणपोषण खाती मजबूर करेला । ई बिआह के दोसरका मतलब बिधवा आदि के समाज में सम्मान आ अधिकार देबे खाती ह। बिआह समाज में जामल लईकन के स्थिति के निर्धारण करेला आ संपत्ति के उत्तराधिकार देला भोजपुरी संस्कृति में बिआह से जामल संतान के ही उत्तराधिकार दिहल जाला।
 
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